मिलावट की गर्त में सिसक रहा उपभोक्ता

नेपाल के सप्तरी जिला के राजबिराज नगरपालिका-10 स्थित डुमरी शिवथान से 1 सितंबर, 2014 को खबर आयी कि शंकर यादव के घर के सभी नौ सदस्य मिलावटी तेल के खाने की वजह से गंभीर रूप से बीमार हो गए. जिसके चलते सभी सदस्यों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा.

यहां ध्यान देने योग्य बात है कि ऐसी घटनाएं दुनियाभर में रोजाना घटती
रहती है और घटना घटने के बाद दोषी पैसे के बल पर आसानी से छूट जाता है या मामूली सी सजा पाकर फिर से मिलावटी कारोबार में रम जाता है. वहीं उपभोक्ता इसे मामूली घटना मानकर और भूलकर मिलावटी की घटना को नजरअंदाज करने लगता है.

ऐसे हालात को दूर करने के लिए ही संयुक्त राश्ट्र संघ के मार्गदर्षन में उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए 1983 में 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित हुआ था और तभी से प्रत्येक वर्ष 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है लेकिन लंबे समय बीत जाने के बाद भी विश्वभर में उपभोक्ता अब तक जाने-अनजाने में भी अपनी शिकायतें दर्ज नहीं कराते.

देखा जाए तो भारत में ही 93 फीसदी उपभोक्ता अपनी शिकायत उपभोक्ता फोरम में दर्ज नहीं कराते. गौर करें तो प्रत्येक व्यक्ति उपभोक्ता है चाहे उनकी आमदनी और सामाजिक स्थिति कोई भी हो. चूंकि प्रत्येक उपभोक्ता को उत्पाद के बारे में सुरक्षा पाने, चुनने व उसके बारे में सुने जाने का अधिकार होता है. इसके बावजूद हर उपभोक्ता अपनी जिंदगी में उत्पाद को लेकर कम से कम एक बार तो अवश्य ही ठगा जाता है और न जाने कब तक ठगे जाते रहेंगे.

नेपाल के सीमावर्ती इलाके हो या दुनियाभर का कोई भी कोना, सभी को मिलावटी जैसे गंभीर समस्या से दो-चार होना पड़ता है. नेपाल की ही बात करें तो इसकी सीमावर्ती इलाका कुनौली हो या फिर जोगबनी या फिर भीमनगर-वीरपूर या अन्य सभी जगह इस बात की गारंटी नहीं होती कि आपको जो समान दिया जा रहा है वह असली है और मिलावट मुक्त. लोग सस्ता के चक्कर में सीमावर्ती इलाकों में खरीददारी करने जाते हैं और इस दौरान अधिकतर खरीददार यानि उपभोक्ता इस बात पर नगण्य के बराबर ध्यान देते हैं कि समान मिलावटी है या पूराना हो चुका है.

ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर हम शिक्षित हों या अशिक्षित, इन महत्वपूर्ण चीजों पर क्यों नहीं ध्यान देते. हमें यह समझना होगा कि किसी भी मिलावट या इससे होने वाले घटनाओं के लिए उपभोक्ता ही सबसे पहले जिम्मेदार कारक हैं. हमें खुद सजग होना होगा और ऐसे मिलावटखोरों के प्रति सतर्कता से अपनी आवाज को बुलंद करना होगा. क्योंकि दुकानदार यह भूल जाता है कि ‘‘ग्राहक हमारे परिसर में बहुत ही महत्वपूर्ण अतिथि होता है. वह हम पर आश्रित नहीं होता बल्कि हम उस पर निर्भर होते हैं.’’

अब ऐसा महसूस होता है जैसे मानों बाजार में ग्राहक कुछ भी नहीं है बल्कि दुकानदार, रिटेलर ही सर्वेसर्वा हैं. देखा जाए तो उपभोक्ता को हर स्तर पर ठगा जाता रहा है. सात दिनों के भीतर काले रंग को गोरा करने या मोटे व्यक्ति को छरहरा बनाने जैसे झूठे और भ्रामक वायदे करने वाली कंपनियां उपभोक्ताओं की भावनाओं के साथ तो खिलवाड़ कर ही रही है, साथ ही कठोर परिश्रम से अर्जित धन का दोहन भी कर रही है. आर्थिक गतिविधियों के क्रियान्वयन में उपभोक्ताओं का असीम महत्व है और इस सत्यता को गांधी जी ने भी स्वीकारा था.

अफसोस की बात यह है कि अंधाधूंध मुनाफा कमाने की चाह में व्यापारी एवं निर्माता आमजन की संवेदनाओं और पैसे की परवाह नहीं करते. यही नहीं वे उपभोक्ताओं की जान से खेलने तक से नहीं हिचकते. तमाम खाद्य पदार्थ जिनमें दूध ही नहीं, बल्कि दवा तक में धड़ल्ले के साथ मिलावट की जा रही है. कहने का यथार्थ यह कि ऐसा कोई भी खाद्य पदार्थ नहीं बचा है जो मिलावट की जद से बाहर हो. उपभोक्ताओं की समस्याओं का आलम यह है कि उत्पाद को लेकर उन्हें न तो उगलते बनता है और न ही निगलते.

बाजार में जो उत्पाद उपलब्ध है, उन्हीं को खरीदना लोगों के लिए मजबूरी बन गया है लेकिन हमें इतना मजबूर भी होने की जरूरत नहीं है और अपने आप को बाजार के हवाले कर देने की. मौजूदा दौर में बाजार में उत्पाद की पर्याप्त उपलब्धता लोगों को विविध प्रकार की वस्तुओं एवं सेवाओं में कोई एक चुनने का अवसर प्रदान करती है. हमें घटिया गुणवत्ता वाली उत्पादों का बहिष्कार कर कंपनियों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए विवश करना होगा.

इसके अलावा, किसी उत्पाद की गुणवत्ता में पाए जाने पर हम सीधे उपभोक्ता फोरम में शिकायत कर सकते हैं. जहां पर इन शिकायतों का निपटारा होता है और उचित न्याय मिलने की संभावना रहती है.

जागरूकता की कमी और समयाभाव के कारण उपभोक्ता अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाते. वे इस शोषण को अपनी नियति मान लेते हैं. कईयों ऐसे लोग हैं, जिन्हें पता ही नहीं कि उपभोक्ता अधिकार क्या होते है, इनमें उच्च शिक्षित लोग भी शुमार हैं. दरअसल कमी कानून में भी है और प्रशासनिक व्यवस्था में भी. इसलिए दोनों के बीच संतुलन होना काफी आवश्यक है.

उपभोक्ता अधिकार दिवस का मतलब होता है उपभोक्ता के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए मनाया जाने वाला दिवस. जागरूक उपभोक्ता न केवल शोषण से अपनी सुरक्षा करता है बल्कि समूचे निर्माण और सेवा क्षेत्र में दक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही को भी प्रेरित करता है. प्रत्येक व्यक्ति उपभोक्ता है. यदि उसके हितों की रक्षा न हो रही हो तो वह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अधीन उसे प्राप्त कर सकता है.

उपभोक्ताओं के अधिकारों के हनन पर नियंत्रण के लिए उपभोक्ता संगठनों और जागरूक समाज के सहयोग से नियमों का सख्ती से पालन कराया जाना एक सकारात्मक कदम हो सकता है. उपभोक्ता संरक्षण कानून को प्रभावकारी बनाने तथा अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए यह आवश्यक है कि इन अदालतों को कम खर्चीला, सरल तथा तीव्र न्याय देने वाला बनाया जाए, अन्यथा उपभोक्ताओं का विश्वास इस व्यवस्था से उठ जाएगा और यह किसी के हित में नहीं होगा.

उपभोक्ताओं की जागरूकता के स्तर को किसी देश की प्रगति का सूचक माना जा सकता है, परंतु यह जागरूकता तभी सार्थक होगी, जब उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार सक्रिय भूमिका निभाएगी. हमें यह याद रखना होगा कि जागरूक उपभोक्ता न केवल शोषण से अपनी सुरक्षा करता है बल्कि समूचे निर्माण और सेवा क्षेत्र में दक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही को प्रेरित करता है. उपभोक्ताओं की जागरूकता के स्तर को किसी देश की प्रगति का सूचक माना जा सकता है परंतु यह जागरूकता तभी सार्थक होगी जब उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार के साथ-साथ आम नागरिक भी सक्रिय भूमिका निभाए.

- निर्भय कर्ण

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