हिन्दी दिवस मनाने का औचित्य क्या है?


निरंजन मिश्रा
एक तरफ आज से 71 साल पहले 9 अगस्त 1942 को आजादी की लड़ाई में महात्मा गाँधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया था. सपना था अंग्रेज भी जायेंगे और अंग्रेजियत भी.

जबकि दूसरी तरफ 175 साल पहले 12 अक्टूबर 1836 को लार्ड मैकाले ने अपने पिता को लिखे पत्र में कहा था कि 'आगामी 100 साल बाद हिंदुस्तान में ऐसे बच्चे होंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज
होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी.

स्वतंत्रता प्रप्ति के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी. 13 सितंबर,1949 को संविधान सभा की बहस में भाग लेते हुए 'पंडित जवाहर लाल नेहरू' ने कहा था कि किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता. कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती. भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना चाहिए.

वर्तमान समय में जब हम अपने समाजिक बोल-चाल और रीति-रिवाज पर नजर डालते है तो यह पाते है कि लार्ड मैकाले की भविष्यवाणी सच साबित हो रही है. और हमारे दूरदर्शी प्रधानमंत्री 'पंडित नेहरू' का हिन्दी को अपनाने का सपना आज आजादी के 67 साल बाद भी अधूरा है.

‘थॉमस बैबिंगटन मैकाले’ ब्रिटेन का राजनीतिज्ञ, कवि, और इतिहासकार था. सन् 1834 से 1838 तक वह भारत की सुप्रीम काउंसिल में लॉ मेंबर तथा लॉ कमिशन का प्रधान रहा. प्रसिद्ध दंडविधान ग्रंथ "दी इंडियन पीनल कोड" की पांडुलिपि इसी ने तैयार की थी.

आज भारतीय संस्कृति में हिन्दी सिर्फ कहने को ही हमारी मातृभाषा है. भारत को यह दुर्दिन दिखाने के पिछे लार्ड मैकाले का बहुत बड़ा हाथ है. व्यापार के बहाने आकर भारतीय संस्कृति का सम्मुल नष्ट करने का सपना देखने वाले अंग्रेजों में सबसे घृणित अंग्रेज मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटेन की संसद में भारत के प्रति अपने विचार प्रकट करते हुए कहा था कि मैं भारत में काफी घुमा हूँ. दाएँ- बाएँ, इधर उधर मैंने यह देश छान मारा और मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो, जो चोर हो. इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है, इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे. जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है और इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पुराणी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था, उसकी संस्कृति को बदल डालें, क्यूंकी अगर भारतीय सोचने लग गए की जो भी विदेशी और अंग्रेजी है वह अच्छा है और उनकी अपनी चीजों से बेहतर हैं, तो वे अपने आत्मगौरव, आत्म सम्मान और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बन जाएंगे जैसा हम चाहते हैं. एक पूर्णरूप से गुलाम भारत.

अपने इस सपने को साकार करने के लिए 1858 में लोर्ड मैकोले द्वारा Indian Education Act बनाया गया. इसके तहत भारत में मौजूद सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया.

वो था अपना भारत जिसके चारित्रिक आदर्श और गुणवता का पुरे विश्व में डंका बजता था. लेकिन अंग्रेजों ने हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक संपदा 'माँ हिन्दी' में सेंध डालकर भारतीय संस्कृति में अंग्रेजी का एक ऐसा बीज रोपण कर दिया जिसके कुप्रभाव से आज भारतीय संस्कृति खतरे में पड़ी नजर आ रही है. हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, 'वर्धा' के अनुरोध पर 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष 'हिंदी दिवस' के रूप में मनाया जाता है. आज पुरे 60 साल हो गए हमे हिन्दी दिवस मानते हुए, लेकिन कठिन दौर से गुजर रही इस विरासत को बचाने के सार्थक कदम आज भी नजर नही आ रहे है.

हम बचपन से ही सुनते आ रहे है कि, हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है. लेकिन सूचना के अधिकार के तहत एक ऐसा खुलासा हुआ है जिसे जानने के बाद हिन्दी पर तरस आती है, और गुस्सा आता है हमारे नीति-नियताओ पर. राष्ट्रभाषा के विषय में सूचना के अधिकार कानून के तहत माँगी गई जानकारी में, लखनऊ की आरटीआई कार्यकर्ता 'उषा शर्मा' को दी गई जानकारी इस ओर इंगित करती है कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं हैं. गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग से मिली सूचना के अनुसार भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी भारत की राजभाषा केवल राजकाज की भाषा तक सीमित हैं. भारत के संविधान में राष्ट्रभाषा का कोर्इ उल्लेख नहीं है.

कहा जाता है, ''जब से जागो तभी सबेरा'', अतः अभी भी समय है हिन्दी को बचाने का वरना प्रत्येक वर्ष हिन्दी दिवस मनाने का कोइ औचित्य नही रह जाएगा. मेरा मतलब यह कतई नही है कि हम दूसरी भाषाओं को ना अपनाए, वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपना स्थान सबसे ऊपर रखने के लिए हमे और विदेशी भाषाएँ भी जाननी होगी. लेकिन हमे पहले अपनी मातृभाषा पर पकड़ मज़बूत बनानी होगी. हमे इन पंक्तियों पर गौर करना होगा कि,

''हिन्दी में हम काम करेंगे पहले मन में संकल्प करें,
निश्चय होकर आरंभ करें, विश्वास न मन में अल्प करें,
पहले यदि कुछ मुश्किल होगी धीरे-धीरे मिट जाएगी,
अभ्यास निरंतर करने से मज़बूत पकड़ हो जाएगी.''

-निरंजन मिश्रा

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