मधुश्रावणी पूजा

सुगंधा झा
मधुश्रावणी बिहार के मिथिलांचल का परम्परागत त्योहार है. नई नवेली दुल्हन शादी के बाद पहले सावन में इस त्योहार को करती है.

मधुश्रावणी अक्षयसुहाग की कामना से श्रावण कृष्ण पंचमी से श्रावण शुक्ल तृतया (जुलाई-अगस्त) तक तेरह दिन महादेव शिवशंकर अर्धांगिनी महागौरी की आराधना का व्रत है.

मधुश्रावणी पूजा में नाग देवता, गौरी, शांति कलश, सूर्य, चंद्रमा, नवग्रह की पूजा की जाती है. पति की रक्षा और सुहाग के लिए विधि विधान से यह पूजा की जाती है.

यह पूजा शादीशुदा अपने मायके
आ कर करती हैं इस पूजा में उपयोग होने वाली सभी चीजें युवती के ससुराल से आती है. पूजा सामग्री से लेकर श्रृंगार और खाने के सामान तक सुबकुछ ससुराल से ही आता है.

इस पूजा में हरे रंग का इस्तेमाल ज्यादा होता है क्योकि सावन महिना ही हरयाली का है. इसलिए शादीसुदा हरे रंग की सारी और हरे रंग की ही लाख की चुरिया पहनती है.

इसमें सुबह को पूजा और कथा होती है और शाम को बांस की बनी हुई टोकरी को फूल और पत्तों से सजाई जाती है.
Neemi Saatish Thakur

इस पूजा में पूरे तेरह दिनों तक कथा होती है जिसमे पहले दिन नाग-नागिन की कथा, दूसरे दिन महादेव की पुत्री मनसा और मंगला गौरी की कथा सुनाई जाती है, तीसरे दिन पृथ्वी जन्म और समुद्र मंथन की कथा, चौथे दिन सती और पतिव्रता की कथा, पांचवें दिन महादेव परिवार (उमा, पार्वती, गंगा) की कथा, छठे दिन गंगा और गौरी जन्म की कथा, सातवें दिन गौरी तपस्या की कथा, आठवें दिन गौरी विवाह कथा, नवें  दिन पार्वती की माता मैना के मोहभंग की कथा, दसवें दिन कार्तिक और गणेश जन्म की कथा, ग्यारहवें दिन राजा हिमालय की बेटी संध्या की कथा, बारहवें दिन बाल बसंत और मध्यस्थ राजा की बेटी गोसौनि की कथा, तेरहवें दिन राजा श्रीकर्क की कथा होती है.

मधुश्रावणी पूजा के अंतिम दिन नवविवाहित दंपति मिलकर पूजा करते हैं.

इस दिन नवविवाहिता अपने हाथों से घऱ की दूसरी सुहागनों को श्रृंगार का सामान देती हैं और मीठा खाना खिलाती हैं. घर परिवार को बड़े लोगों का आशीर्वाद लेती हैं.

इस पूरे तेरह दिनों तक नवविवाहिता एक ही समय भोजन ग्रहण करती हैं वह भी बिना हल्दी और घी में बना शुद्ध शाकाहारी खाना.

सूर्यास्त होने के बाद पानी तक नहीं पिया जाता है. यह त्योहार मिथिलावासियो में नवदम्पतियो के लिए सबसे बड़ा और लंबा त्योहार है इस दौरान घरों में गाना-बजाना, गीत-नाद भी होता है.

-सुगंधा झा

Comments

  1. बहन सुगन्धा
    अपनी संस्कृति के बारे में आपने बहुत सुन्दर लिखा है

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