Yoga: India’s Enduring Soft Power in a Changing World By Nivedita Amoli

In an era marked by rising stress, lifestyle-related diseases, and social divisions, the search for practices that promote health and harmony has become more important than ever. Among the many contributions India has made to the world, yoga stands out as a timeless tradition that continues to unite people across

बंटवारे की राजनीति

सुगंधा झा
तेलंगाना को भारत का 29वां राज्य घोषित करने के बाद से कई नए राज्यों को बनाने की मांग उठने लगी है. आखिर इसे क्या कहे वोटों के लिए गन्दी राजनीति.

तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की मांग कई सालों से की जा रही थी, तब इसको अलग राज्य का दर्ज़ा क्यों नहीं दिया गया. जबकि 2014 के लोकसभा के चुनाव होने से चंद महीने पहले ही इसे अलग राज्य का दर्ज़ा मिल रहा है. 

2014 लोकसभा चुनाव में फायदा उठाने के लिए यह कदम उठाया गया है, क्योकि आंध्र प्रदेश में लोकसभा
की 42 सीट है जिसमे की 17 सीट तेलंगाना क्षेत्र की है. इनमे से 12 सीटो पर कांग्रेस का कब्ज़ा है.

इसी तरह विधानसभा की 294 सीटों में से 119 तेलंगाना से आती हैं जिसमें 50 से ज्यादा सीटों पर कांग्रेस का कब्ज़ा है.

कांग्रेस को तेलंगाना से ज्यादा अपनी सीटों की फ़िक्र है. केवल अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने के लिए ये कुछ भी कर सकते है. कहां इन लोगों को देश की एकता अखंडता को बनाये रखना चाहिए जबकि ये लोग देश को ही टुकड़े करने पर तुले है.


आखिर इस देश को कितने राज्यों की जरुरत है...विभाजन अपने आप में ही त्रासदी है चाहे वह देश का हो या राज्यों का बंटवारा. यह हमारी एकता अखंडता पर सवालिया निशान लगाता है.

तेलंगाना बनने से कई नए राज्यों को अलग करने की मांग की जा रही है. महाराष्ट्र में विदर्भ, मुंबई, बंगाल में गोरखालैंड, असम में बोडोलैंड और कर्बी...बिहार में मिथिलांचल... उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड और पूर्वांचल को अलग करने की मांग तेज हो गयी है.

हो सकता है कि आने वाले समय में ज़िलों में भी बंटवारे की मांग तेज़ हो जाये...यह सिलसिला तो थमने से रहा.

राज्यों में क्यों कुछ इलाके पिछड़े रह जाते है यह एक चर्चा का विषय है. क्यों हमलोग देश को एक सूत्र में पिरों कर नहीं रख सकते, हर मुद्दे पर राजनीति ठीक नहीं है अगर देश को जोड़ने वाले ही इसे तोड़ने लगेंगे तो इस विशाल भारत देश का क्या होगा हम सोच भी नहीं सकते है.

आज़ादी के समय भारत से पाकिस्तान का बंटवारा और जम्मू कश्मीर को लेकर हम आज भी लड़ रहे हैं तो फिर क्यों देश के भीतर भी राज्यों और जिलों को बांटने की नीति अपनाई जा रही है. यह कहां तक सही है.

उन्हें समृद्ध बनाने के लिए राज्य और केंद्र सरकारों पर दबाव बनाना चाहिए ना कि विभाजन की नीति अपनानी चाहिए. विभाजन ही हर समस्या का हल होता तो सभी छोटे राज्य सम्पन होते. एक बार झारखण्ड, उत्तराखंड, छतीसगढ़ की स्थिती देख ली जाये तो सबकुछ खुद ब खुद समझ में आ जायेगा.

अगर इसी तरह से देश के टुकड़े होते रहे तो इस देश में 100 राज्य भी कम पर जायेंगे. अभी भी केंद्र सरकार के पास 50 नए राज्यों को बनाने की मांग का प्रस्ताव लंबित है. इस और ध्यान देने की बहुत जरुरत है.

-सुगंधा झा

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