तमस का वध

अभिनव अरुण
न समझो चीख और चिल्लाहटें हैं
ये युग परिवर्तनों की आहटें हैं
समंदर चढ़ रहा है गौर से सुन
तिमिर के और गहरे स्वप्न मत बुन
ह्रदय का ज्वार अब अंगार बनके
खड़ा होगा समर में आज तनके

नहीं अब हम निहत्थे खेत होंगे
न बेबस चमड़ियों पर बेंत होंगे
अभय ने आज हमको वर लिया है

गला औज़ार सब बख्तर किया है
ये हंसिया फावड़े कल सब गले हैं
लो हम विद्रोह के पथ पर चले हैं

ह्रदय में एक रहँट सी घूमती है
जो भर कर टंकियों में लाल लावा
भूगर्भी क्यारियों को सींचती है
भगत के खेत में बिरवे उगे हैं
तने तलवार जैसे छरहरे हैं
हैं इनकी बालियाँ बेहद नुकीली
तुम्हारी आँख में सब गड़ रहे हैं
मगर पौधे दुआ में बढ़ रहे हैं

न अब छंदों की हमको सीख देना
न आदर्शों की हमको भीख देना
हमें आज़ाद नज़्में भा रही हैं
चलन को खोखला बतला रही हैं
तुम्हारी पटरियों सदियों चले हैं
तुम्हारे सान की खातिर गले हैं
सुनो हम सब उबलते त्रास वाले
थे जितने शब्द सब अंगार बनकर
खड़ी उन चोटियों पर बढ़ चले हैं

तुम्हारी लाल पीली या कि नीली
मुलम्मों की छटा बेहद नशीली
हमारे दम से थी अब न रहेगी
नदी गंदली सही किन्तु बहेगी
ये नाले बाँध बंधे सब ढहेंगे
थे ज़ंजीरों में मृत अब सांस लेंगे

कि हम सूरज को खा जाने का माद्दा
सितारे तोड़ कर लाने का माद्दा
छुपाये झुर्रियों में थे अभी तक
निकल कर म्यान से बाहर हैं आये
मुकाबिल दमन के पैगाम लाये
किवाड़ें बंद कर सांकल चढ़ा लो
या सोने की सही कब्रें मढ़ा लो
सुनो ये फ़ौज परिवर्तन की कैसी
शहर के रास्तो से जा रही है
तराने आचमन के गा रही है

ह्रदय का ज्वार सड़कों पर फबेगा
कफ़न को बाँध सीने पर कहेगा
मचाने और बंकर सब हटा दो
किधर तोपें लगीं ये भी बता दो
हमें सहना नहीं है ये है ठाना
नहीं दबने का हासिल कुछ है जाना
तो अब रण हो रहेगा और अब ही
है शोणित तो बहेगा और अब ही
उजाला आगे बढ़ छाती चढ़ेगा
वो किरणों से तमस का वध करेगा


-अभिनव अरुण

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